जम्मू-कश्मीर में 3 बड़े बदलाव की तैयारी।




जम्मू कश्मीर : जम्मू-कश्मीर में नए बने हालात के मद्देनजर कई तरह के अनुमान लग रहे हैं। पहले सेना की प्रैस कांफ्रैंस में अमरनाथ यात्रा पर खतरे की आशंका और आतंकियों की साजिश का खुलासा किया गया। उसके बाद राज्य के गृह विभाग ने एडवाइजरी जारी कर कहा कि जम्मू-कश्मीर के सभी पर्यटक और अमरनाथ यात्री जल्द से जल्द लौट जाएं।

जम्मू-कश्मीर में एडवाइजरी जारी होने के बाद पंजाब सरकार ने भी राज्य में हाई अलर्ट जारी कर दिया है। थल सेना और वायुसेना के अलावा बड़े स्तर पर जम्मू-कश्मीर में अर्ध सैनिक बलों की तैनाती से ऐसी संभावना जताई जा रही है कि आने वाले दिनों में केन्द्र सरकार जम्मू-कश्मीर में कोई बड़ी कार्रवाई कर सकती है। सूत्रों के मुताबिक अगले सप्ताह केंद्र सरकार जम्मू-कश्मीर में तीन बड़े एक्शन कर सकती है। पहला अनुच्छेद-35-ए और दूसरा धारा-370 खत्म तथा इसके साथ जम्मू-कश्मीर का तीन राज्यों में बंटावारा होने के भी आसार हैं।

ये हो सकते हैं 3 नए राज्य
जिस तरह के हालात बन गए हैं, उससे राजनीतिक हलकों में यह चर्चा छिड़ गई है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आने वाले दिनों में जम्मू-कश्मीर में 3 अलग राज्यों की घोषणा कर सकते हैं। इनमें जम्मू को राज्य, कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश और लद्दाख को भी केंद्र शासित प्रदेश बनाया जा सकता है। यह एक राज्य को बांटने का मामला है, इसकी जानकारी प्रधानमंत्री संसद में देंगे। वहीं राज्य विधानसभा की सीटों के परिसीमन का भी फैसला लिया जा सकता है। अधिकतर चर्चा राज्य के बंटवारे और अनुच्छेद 35-ए को हटाने की चल रही है।
पाकिस्तान के साथ युद्ध के भी आसारॉ
घाटी में पैदा हुई ताजा स्थिति को लेकर यह आशंका जताई जाने लगी है कि पाकिस्तान भारत के खिलाफ बड़ी साजिश रच रहा है और यह भी चर्चा है कि पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर पर हमला कर सकता है। पुलवामा हमले के बाद भारत की तरफ से पाकिस्तान के खिलाफ की गई सैन्य कार्रवाई के दौरान भारतीय विंग कमांडर की पाकिस्तान से रिहाई के समय अमरीका के राष्ट्रपति ने कुछ अ‘छा होने की बात कही थी। तभी से यह आशंका जताई जाने लगी थी कि जम्मू-कश्मीर को लेकर अमरीका मध्यस्थता कर रहा है। पिछले दिनों पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ मुलाकात के बाद अमरीका द्वारा कश्मीर मसले को लेकर मध्यस्थता का राग अलापने से भी यह आशंका है कि जम्मू-कश्मीर में कुछ बड़ा होने वाला है। ट्रंप ने तो यहां तक कह दिया था कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उन्हें जम्मू-कश्मीर मसले पर मध्यस्थता की बात कही है, मगर ट्रंप की यह बात झूठ साबित हुई थी। यह भी आशंका जताई जाने लगी है कि पाक प्रधानमंत्री की ट्रंप के साथ मुलाकात कहीं जम्मू-कश्मीर को लेकर जंग के लिए तो नहीं थी।
बंटवारे का एक कारण यह

अमित शाह के गृह मंत्री का पद संभालने के बाद से ही जम्मू-कश्मीर के फिर से बंटवारे यानी इसके निर्वाचन क्षेत्रों में बदलाव के लिए परिसीमन आयोग के गठन की चर्चा चल रही है। अमित शाह की जम्मू-कश्मीर के रा’यपाल सत्यापाल मलिक से मुलाकात के बाद इस चर्चा को बल मिला था। भाजपा ने परिसीमन के मुद्दे को उठा कर यह जताने की कोशिश की है कि जम्मू-कश्मीर के इस पेचीदा मसले को वह आसानी से छोडऩे वाली नहीं है। जम्मू-कश्मीर में आखिरी बार 1995 में परिसीमन हुआ था। उसके बाद वहां की स्थितियां बदली हैं, लेकिन निर्वाचन क्षेत्रों का नए सिरे से निर्धारण नहीं हुआ है। मौजूदा निर्वाचन क्षेत्रों की स्थिति की वजह से राज्य के 3 संभागों (कश्मीर, जम्मू और लद्दाख) में कश्मीर को राजनीतिक वर्चस्व हासिल है। सत्ता में भागीदारी से लेकर संसाधनों पर अधिकार और आॢथक सहायता प्राप्त करने में कश्मीर (घाटी) बाजी मार ले जाता है। इसके मुकाबले बड़े क्षेत्रफल और ज्यादा आबादी वाले जम्मू और लद्दाख लगातार पिछड़ते जा रहे हैं। जानकार मानते हैं कि जम्मू-कश्मीर के तीनों इलाकों में समानता तभी मुमकिन है, जब नए सिरे से निर्वाचन क्षेत्रों का निर्धारण हो। जम्मू-कश्मीर की 87 विधानसभा सीटों में कश्मीर के अंतर्गत 46 सीटें आती हैं। जम्मू के दायरे में 37 सीटें और लद्दाख के अंतर्गत 4 सीटें आती हैं। कश्मीर में ज्यादा विधानसभा सीटों की वजह से विधानसभा में इनका वर्चस्व होता है। सत्ता में भागीदारी भी कश्मीर की अधिक है। राज्य सरकार नीतियां बनाने में कश्मीर पर ज्यादा फोकस रखती है। पावर डिस्ट्रीब्यूशन में असमानता की वजह से जम्मू और लद्दाख की जनता अपनी अनदेखी की शिकायत करती है। पैंथर्स पार्टी 2005 से इस मसले को उठा रही है। इसी असमानता को खत्म करने के लिए जम्मू में 10 से लेकर 15 विधानसभा सीटें बढ़ाने की मांग उठ रही है। 

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